मंगलवार, अगस्त 28, 2012

खामोश


खामोश

मेरे नसीब में
तेरा साथ
था ही नहीं
तो तुझको
क्या दोष दूं मैं ................ 
मदहोश कर गया 
वो साकी  मुझे 
अब  तलक
नींद में हूँ 
किसी और को
क्या होश दूं मैं ..............
इस कदर
तोडा जालिम ने 
कि खुद ही
संभल  न पाया
तो किसी को
क्या जोश दूं मैं ................... 
जब  पलते नहीं
मुझसे मेरे ही
अरमान तो
किसी के अरमानों को  
क्या पोस दूं मैं .......................
तडपता रहेगा
ये दिल
तेरी याद में
यूँ ही " कायत "  
जब तक 
ये प्राण
न कर खामोश दूं मैं .....................
 
कृष्ण कायत 
 

रविवार, अगस्त 19, 2012

ठहराव


ठहराव
गुजर जो कहर   गया है
  ये जीवन भी ठहर गया है .............
 देख सिसकती ये हालत
 खो चुकी जीने की चाहत
भुलाने की कोशिश में
 और गहरी होती याद
हमसाया ही  बन गया
कैसा  कठोर निषाद
मृत हो गया है मन
जैसे पी ज़हर गया है
गुजर जो कहर   गया है
  ये जीवन भी ठहर गया है .......... 
  बिछड़ा साथी, उजड़ा कारवां
चिलचिलाती धूप में भी
अंधियारे का आभास है
मंजिल ओझिल, राहें गुम
गम भरी साँसों की भी
अब नहीं कोई आस है
खोया - खोया सा जहाँ
कैसी निस्तब्धता छाई है
लूट ले गया सारी    रौनकें
बीत ये जो पहर गया है
गुजर जो कहर   गया है
  ये जीवन भी ठहर गया है .......... 
krishan kayat
http://krishan-kayat.blogspot.com

गुरुवार, अगस्त 16, 2012

ज़माना

 
           ज़माना
 
ये ज़माने को क्या हो गया है ............   -२
 
कोई पूर्व में है जाग रहा ,
                             कोई पश्चिम को है भाग रहा
आराम की भी नहीं फुर्सत
                                चलते - फिरते आँखें मूंदें   
 तलाशते सब  इधर  उधर
                            जाने  किन   तृष्णाओं को ढूंढें   
मिल गया है खास या फिर 
                               सभी का कुछ खो गया है
 
ये ज़माने को क्या हो गया  है.........................   -२
 
मलमल के कोमल गद्दों पर 
                                 वो सोने की चेष्टा है कर रहा 
नींद नहीं उसकी आँखों में 
                         किसी अनजानी सोच से है डर रहा 
उधर एक लाचार - फटेहाल 
                                         सड़कों पर है घूम रहा 
लिए मन में जीने की आस 
                               आराम को है जगह दूंढ़ रहा 
लो, वो देखो थक हार कर 
                                 फूटपाथ पर ही सो गया है 
 
ये ज़माने को क्या हो गया ..........................  -२
 
घुट घुट कर हैं सब जी रहे 
                                 बगावती होंठों को है सी रहे 
आंसुओं का सैलाब 
                                       दिलों में रोक रखा है 
बूँद भी न गिरने पाए 
                                       काँटों से जोख रखा है 
छोड़ा किसने सब्र का दामन 
                               भीगा है जो जहाँ का आँगन 
देख हालत संसार की 
                                 आज आसमां भी रो गया है 
 
ये ज़माने को क्या हो  गया है....................   -२ 
 
उगाई है जो फसल 
                                       वो ही तो काटेंगे 
दुःख का भरा है हर कोई 
                             सुख कौन कहाँ से बांटेंगे 
न वो पहले सी  बहार 
                            न फूलों की मादकता है 
रिश्वतखोरी , भ्रष्टाचार 
                        अत्याचार व अराजकता है 
फसलें जैसी पनप रही हैं 
                       कौन विष बीज बो गया है 
 
ये ज़माने को क्या हो गया है .......................  -२     
 

बुधवार, अगस्त 15, 2012

यादों के साये

 
 
 
 
यादों के साये 
 
हवा लहराई  
घटा गहराई
कोयल की कूक
सुन कर  थी
वो भी मुस्कुराई 
मुस्कुराते देख उसे 
बरबस ही 
मेरे होंठों पर भी
थी मुस्कान 
उभर आई 
भूल गया 
अब तो मैं 
भी मुस्कुराना 
वो तो किसी की 
हो गई 
और मैं 
हो गया बेगाना 
मेरी जिंदगी से 
तो अब 
लगता रूठ 
गई है बहार 
वो भी 
तब तलक थी 
जब तलक 
पास था यार 
अब न तो 
हवा लहराती है 
और न ही 
घटा गहराती है 
कोयल की कूक 
भी अब तो 
दिल को जलाती है 
पहले था 
खुद उसने सताया 
अब हर वक्त 
उसकी याद सताती है 
अब हर वक्त 
उसकी याद सताती है ............  

रविवार, अगस्त 12, 2012

दिलासा

 
 
 
दिलासा
 
मत रो
मत दिल को तडफा 
ऐ राही ..... 
सफ़र तो तय
करना ही होगा
मत सोच
सफ़र है मुश्किल 
न ही घबरा तू 
कमजोर हैं 
तेरे आगे  
ये पथ की रुकावटें
जरा साहस से
तो टकरा तू
तेरे अकेले 
क़दमों में ही 
बहुत दम होगा 
जब सोच है तेरी 
कोई ख़ुशी 
तेरे पास रही ही नहीं 
तो मत सोच 
अब तेरी जिंदगी में 
कोई गम होगा 
रख बुलंद हौंसले 
कर कैद अरमान 
न मन को बहका 
सफ़र तय होगा 
मंजिल भी मिलेगी 
क्या हुआ जो 
साथ छूटा 
बिछुड़ गया हमराही
मत रो
मत दिल को तडफा
ऐ राही ...........
 
 
 
 

शनिवार, अगस्त 11, 2012

विरहन की तड़फ

 
 
 
विरहन की तड़फ  
 
 
 
ओह निर्मोही !
मेरी जिंदगी थी
तेरी बंदगी ....
पर तूने मुझसे ही  
क्या कर डाली
ये दिल्लगी ......
साथी बना के
मुझको जीना सिखाया
जीवन का चमन
फूलों से खिलाया
सांझ हुई हो
या हो भौर
हाथ मिला कर चलते रहे
मंजिल की ओर ........
फिर क्यों ?
आखिर क्यों .......
बीच मंझधार 
छोड़ गया तू 
जीवन  रूख से
मेरा मुख भी
मोड़ गया तू
तन्हाई के  काँटों भरा
है ये सफ़र
मैं कैसे काटूं ......
तू ही था
मेरे सुख दुःख का साथी
अब ये दुःख मैं
किस से बाँटूं.........
अब ये दुःख मैं
किस से बाँटूं ...........
 
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