बुधवार, मार्च 30, 2016

नाकाम

















 किस कद्र गिर गए हैं कुछ लोग 
 आज ज़माने में 
 दिखावा करते हैं प्यार का 
 नफरत को छुपाने में
 मक्कारी और स्वार्थ छिपा है
 प्यार के अफ़साने में
 घटिया सोच नीयत में खोट 
 पर सभ्य बनते हैं ज़माने में
 कसमें वादे प्यार वफ़ा के मायने नहीं
 ढोंग हैं हर तराने में
 धोखा है हर बात में उनकी 
 नई चाल हर बहाने में
 जान लिया पहचान लिया 
 फिर भी "कायत" नाकाम रहा 
 इस दिल को समझाने में...


http://krishan-kayat.blogspot.com

बुधवार, मार्च 23, 2016

रंग बदलते
लोगों के
रंग लगाऊं
क्या मैं यार
मतलब के लिए
जताते हैं
अपनापन
कैसे कह दूं
इसको प्यार
अरमान उमंगें
दमित हैं मन में
कुत्सित कुंठा का
हुआ प्रसार
उच्छश्रृंखलता और
फूहड़पन है
अय्याशी के
सजे हैं बाजार
पाप-पुण्य के
अर्थ हैं बदले
कैसा पावन
है ये त्यौहार
रंग बदलते
लोगों के
रंग लगाऊं
क्या मैं यार...........
  कृष्ण कायत
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