*रसोई गैस के बढ़ते दाम, युद्ध का बहाना और आम आदमी की पीड़ा*
✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।
7 मार्च 2026 को देशभर में घरेलू रसोई गैस (14.2 किलोग्राम) के सिलेंडर की कीमतों में 60 रुपए की बढ़ोतरी कर दी गई और इसके बाद इसकी कीमत 949 रुपए तक पहुंच गई। 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर के दामों में भी 115 रुपए से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। इस बढ़ोतरी के पीछे मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को प्रमुख कारण बताया गया। लेकिन इसी दौरान इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की ओर से व सत्ताधारी सरकार के बहुत से नेताओं द्वारा यह आश्वासन भी सामने आया कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है और आपूर्ति सामान्य बनी हुई है।
यहीं से आम नागरिक के मन में एक गंभीर सवाल खड़ा होता है कि यदि आपूर्ति सामान्य है, तो कीमतों में यह असामान्य उछाल क्यों ? और यदि आपूर्ति पर दबाव है, तो केवल कीमतें बढ़ाकर क्या उस दबाव को कम किया जा सकता है ?
वास्तविकता यह है कि मार्च के अंतिम दिनों तक आते-आते देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आने लगीं, जिन्होंने इन आश्वासनों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। पेट्रोल और डीजल की कमी की आशंका के चलते अनेक पेट्रोल पंपों पर या तो आपूर्ति सीमित कर दी गई या कुछ स्थानों पर पंप अस्थायी रूप से बंद भी देखने को मिले। लंबी-लंबी कतारें, घंटों इंतजार, और कई जगहों पर धक्का-मुक्की व झगड़ों की घटनाएं आम होने लगीं। यह दृश्य किसी सामान्य आर्थिक स्थिति का नहीं, बल्कि एक उभरते संकट का संकेत दे रहे हैं।
सूरत, मुंबई जैसे बड़े शहरों से रसोई गैस सिलेंडर की कमी की भयावह खबरें सामने आने लगीं। कई जगहों पर सिलेंडर की डिलीवरी में देरी, बुकिंग के बाद लंबा इंतजार, और कुछ क्षेत्रों में आंशिक आपूर्ति जैसी स्थितियां बनने लगीं। इसका सबसे अधिक असर उन मजदूरों और दिहाड़ी कामगारों पर पड़ा, जिनका जीवन पहले से ही अस्थिर आय पर टिका होता है। गैस और ईंधन की अनिश्चितता ने उन्हें शहरों में टिके रहने के भरोसे को कमजोर किया, और परिणामस्वरूप पलायन की स्थितियां बनने लगीं।
इस पूरे परिदृश्य की जड़ें वैश्विक घटनाओं में भी दिखाई देती हैं। स्ट्रेट आफ होर्मुज में बढ़ता तनाव ; ईरान , इजरायल व अमेरिका के बीच टकराव - ये सभी कारक अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर होकर पूरा करते हैं, वहां इस प्रकार के तनाव का असर पड़ना स्वाभाविक है। स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा इन परिस्थितियों को लेकर “कोरोना जैसे हालात बनने की आशंका” व्यक्त करना इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करता है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस पूरी स्थिति का बोझ आखिर किस पर पड़ रहा है ?
सरकार द्वारा घरेलू गैस सिलेंडर की बुकिंग अवधि को 25 दिन करना, घरेलू गैस सिलेंडर में 14 किलो की बजाय केवल 10 किलो गैस देने जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि आपूर्ति पर दबाव वास्तविक है। पेट्रोल पंपों पर सीमित आपूर्ति और डीजल की कमी की खबरें भी इसी ओर इशारा करती हैं। ऐसे में यह कहना कि सब कुछ सामान्य है, आम नागरिक के अनुभव से मेल नहीं खाता।
रसोई गैस, पेट्रोल और डीजल - ये तीनों केवल ईंधन नहीं हैं, बल्कि आधुनिक जीवन की आधारशिला हैं। पेट्रोल और डीजल परिवहन की धुरी हैं, जिन पर खाद्यान्न से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं की आपूर्ति निर्भर करती है। जब इनकी कमी या महंगाई बढ़ती है, तो उसका असर केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बाजार की हर वस्तु की कीमत में दिखाई देने लगता है।
एक ओर आम आदमी पेट्रोल पंप की लाइन में खड़ा है, दूसरी ओर उसकी रसोई में गैस की चिंता है। यह दोहरा दबाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक तनाव भी पैदा करता है। मजदूर वर्ग के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है । न तो वह बढ़ती कीमतों को झेल सकता है और न ही अनिश्चित आपूर्ति के साथ अपना जीवन व्यवस्थित कर सकता है।
रसोई गैस की किल्लत के चलते सूरत(गुजरात) से जो कपड़ा और हीरा उद्योग का केंद्र है, वहाँ से हजारों मजदूर (विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, और ओडिशा के) पलायन कर रहे हैं। दिल्ली/NCR (नोएडा, गुरुग्राम) में भी भारी संकट आ गया है। दिल्ली के आनंद विहार और निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर भी प्रवासियों की भीड़ देखी गई। यह स्थिति 2020 के लॉकडाउन के समान ही प्रवासी मजदूरों के लिए एक बड़ा संकट पैदा कर रही है, जहाँ उन्हें रोजी-रोटी और ऊर्जा (रसोई गैस) के बीच चयन करना पड़ रहा है।
पूंजीवादी व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विडंबना है कि वैश्विक संकटों का सीधा प्रभाव आम आदमी पर पड़ता है, जबकि नीतिगत निर्णयों में उसकी भागीदारी नगण्य होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल होती है, और उसका बोझ सीधे उस व्यक्ति पर आ जाता है, जो रोज कमाकर अपनी रोटी जुटाता है।
यहां यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या हर बार वैश्विक परिस्थितियों का पूरा भार आम जनता पर डाल देना ही एकमात्र विकल्प है ? क्या ऐसी कोई नीतिगत संरचना नहीं हो सकती, जो इस बोझ को संतुलित रूप से बांट सके ?
यह संकट हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आर्थिक नीतियों का उद्देश्य केवल बाजार को संतुलित रखना है या समाज को भी सुरक्षित रखना है। क्योंकि जब पेट्रोल पंपों की लाइनें लंबी हो जाएं, रसोई गैस की बुकिंग अनिश्चित हो जाए, और मजदूर अपने घरों की ओर लौटने लगें - तो यह केवल आर्थिक संकेतक नहीं होते, बल्कि यह समाज में बढ़ती असुरक्षा के प्रतीक बन जाते हैं।
अंततः किसी भी देश की प्रगति का वास्तविक मापदंड यही है कि उसके नागरिक कितने सुरक्षित और स्थिर जीवन जी पा रहे हैं। और जब ईंधन जैसी बुनियादी आवश्यकता ही अनिश्चितता और महंगाई के बीच फंस जाए, तो यह स्पष्ट संकेत होता है कि कहीं न कहीं व्यवस्था के भीतर संतुलन बिगड़ रहा है।
ऐसे समय में केवल आश्वासन नहीं, बल्कि संवेदनशील और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता होती है ; ताकि आम आदमी की रसोई की आग और उसके जीवन की गति दोनों सुरक्षित रह सकें।
✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।
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