लड्डू की मिठास और पसीने का खारापन

 लघुकथा


*"लड्डू की मिठास और पसीने का खारापन"*


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


शहर के एक बड़े हॉल में 'मई दिवस' का भव्य आयोजन था। मंच पर सफेद खादी के चमकदार कुर्ते पहने समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों का जमावड़ा था। बैनर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था - "मजदूर एकता जिंदाबाद: शोषण का अंत हो!"

वक्तागण, जो खुद जमीनों और कोठियों के मालिक थे, माइक पर दहाड़ रहे थे, "साथियों! शिकागो के शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हम मजदूरों को उनका हक दिलाकर रहेंगे!" हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था। भाषणों के बाद 'मजदूरों की समस्याओं' पर एक चिंतन सत्र हुआ, जिसमें काजू-किशमिश वाले समोसे और केसरिया लड्डू परोसे गए। सेल्फी ली गई, फोटो खिंचवाए गए ताकि 'गरीबों के प्रति संवेदना' को फेसबुक और अखबारों तक पहुँचाया जा सके।

उसी समय, उस हॉल की बगल वाली निर्माणाधीन इमारत की चौथी मंजिल पर, रामू मजदूर तपती दोपहर में सिर पर मसाले का बट्ठल रखे हुए था। सूरज की लपटें उसकी पीठ जला रही थीं। तभी नीचे से ठेकेदार की दहाड़ सुनाई दी, "ओए हरामखोर! ऊपर क्या देख रहा है? ज्यादा सुस्ती दिखाई तो दिहाड़ी काट लूँगा। काम कर काम!" 

रामू ने पसीना पोंछा और बगल वाले हॉल से आती 'इंकलाब' की आवाजों को अनसुना कर दिया। उसने सोचा, 'शायद अंदर कोई बड़ा त्यौहार है।' दोपहर बाद जब कार्यक्रम खत्म हुआ, तो सभी 'क्रांतिकारी' नेतागण अपनी चमचमाती गाड़ियों में बैठते हुए बोले, "आज का दिन सफल रहा, हमने कर्मचारी, मजदूरों के लिए बहुत अच्छा कार्यक्रम आयोजित किया है।"

तभी गाड़ी के पहिए ने सड़क किनारे पड़े एक खाली लिफाफे को कुचल दिया, जिसमें उस भव्य कार्यक्रम के लड्डू का एक टुकड़ा चिपका था। रामू अभी भी ऊपर ईंटें ढो रहा था, क्योंकि उसकी 'क्रांति' तो बस शाम को पव्वे और बच्चों के लिए रोटियों के इंतजाम तक ही सीमित थी।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

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