मई दिवस का संदेश - शोषण पर रोक ही मानवता का विकास

 *मई दिवस का संदेश - शोषण पर रोक ही मानवता का विकास।*

 ✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


एक मई, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस - वह अवसर जब हम श्रमिक वर्ग की अथक मेहनत, ऐतिहासिक संघर्षों और वर्तमान शोषण की काली सच्चाई को करीब से देखते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था की मुनाफे की असीम हवस ने मजदूरों को चूस लिया है। यह दिन हमें न सिर्फ इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि दृढ़ संकल्प भी जगाता है कि मेहनतकश हाथों को सम्मान मिले, शोषण थमे, और समान विकास का मार्ग प्रशस्त हो।


मई दिवस की कहानी 1886 के शिकागो से शुरू हुई, जब अमेरिकी मजदूरों ने आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग की। हेयमार्केट चौक पर शांतिपूर्ण सभा पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं, कई लोग मारे गए, कई घायल हुए। इस बलिदान ने दुनिया हिला दी। 1889 में पेरिस के सोशलिस्ट इंटरनेशनल ने एक मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस घोषित किया। भारत में यह संदेश 1923 में मद्रास के मजदूर जुलूसों से पहुंचा। कम्युनिस्ट नेता एस.ए. डांगे और बी.टी. रानाडिवे ने इसे आजादी की लड़ाई से जोड़ा। स्वतंत्र भारत में यह ट्रेड यूनियनों का प्रतीक बना - लाखों श्रमिक सड़कों पर उतरते, नारे लगाते: "आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे तंदुरुस्ती।" समय ने इसे मजबूत किया । अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) समझौता, 1919 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी द्वारा वैश्विक श्रम मानकों को निर्धारित करने वाला एक त्रिपक्षीय (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) समझौता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में सामाजिक न्याय, सम्मानजनक कार्य, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों, न्यूनतम मजदूरी और मानव अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत में संविधान के अनुच्छेद 23-24 ने बंधुआ मजदूरी रोकी, फैक्ट्री एक्ट 1948 ने कार्यस्थल सुरक्षित बनाया। लेकिन अब यह विकास उलट रहा है, पूंजी की हवस ने सब कुछ निगल लिया।


वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफे की भूखी है, वह श्रमिकों को मशीन समझती है। भारत सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को समेकित करके चार नए लेबर कोड (श्रम संहिता) 21 नवंबर 2025 से लागू किए हैं, जो 1 अप्रैल 2026 से पूर्णतः प्रभावी हो रहे हैं। भारत में 4 नए लेबर कोड- कोड ऑन वेजेस, इंडस्ट्रियल रिलेशंस, सोशल सिक्योरिटी और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी। इन्होंने 29 पुराने कानूनों को समाहित कर कॉरपोरेट्स को शोषण की खुली छूट दी है। इन्हें 'सुधार' कहा गया, लेकिन विश्लेषक इसे कार्पोरेट अनुकूल बताते हैं। उदाहरणस्वरूप, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड में हड़ताल के लिए 14 दिन का पूर्व नोटिस अनिवार्य कर दिया गया, जबकि नियोक्ता बिना नोटिस छंटनी कर सकता है अगर कर्मचारी 300 से कम हों। फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट से कॉन्ट्रैक्ट वर्कर बढ़े, जिन्हें स्थायी नौकरी या भविष्य निधि का पूर्ण लाभ नहीं मिलता।

2023 के पीएचडीएचएस सर्वे के अनुसार, 90% अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूर (कुल 50 करोड़ श्रमिक) बिना सामाजिक सुरक्षा के जी रहे हैं। कोविड-19 के दौरान 12 करोड़ प्रवासी मजदूर बेरोजगार हुए, फिर भी एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) में छंटनी बढ़ी। न्यूनतम मजदूरी राज्यवार अलग-अलग है - बिहार में 300 रूपए प्रतिदिन व दिल्ली में 600 रूपए प्रतिदिन, लेकिन महंगाई (2025 में 6% से ऊपर) इसे बेमानी बनाती है। पूंजीवादी व्यवस्था में 1% अमीरों के पास देश की 40% संपत्ति है (ऑक्सफैम रिपोर्ट 2025), जबकि मजदूर वर्ग गरीबी रेखा से नीचे धंस रहा है। कारखानों में 12-14 घंटे की पाली, ओवरटाइम बिना भुगतान, और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याएं आम हैं। गिग इकॉनमी (उबर, जोमैटो) में डिलीवरी बॉय बिना बीमा व अन्य सुविधाओं के सड़कों पर दौड़ते हैं , 2024 में 500 से ज्यादा दुर्घटनाओं में मौतें हुई हैं। 

ये कानून कॉरपोरेट्स को मुनाफा कमाने की खुली छूट देते हैं। 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर श्रमिक अधिकार कुचले जा रहे, जैसे गुजरात के हीराचंद दोषी मामले में जहां 1200 मजदूरों को बिना नोटिस हटाया गया। मजदूर कमजोर हो रहे हैं क्योंकि यूनियन कमजोर पड़ीं - ट्रेड यूनियन एक्ट में रजिस्ट्रेशन कठिन हो गया।


आज का मजदूर न सिर्फ गरीब है, बल्कि असुरक्षित भी है। बिहार-यूपी के प्रवासी दिल्ली-मुंबई के निर्माण स्थलों पर काम करते हैं, जहां हादसे (जैसे 2025 का मुंबई ब्रिज गिरना, 20 मौतें) बिना सजा के भुला दिए जाते हैं। महिलाएं टेक्सटाइल मिलों में कम मजदूरी पर जी रही हैं और 40% महिला श्रमिक गरीबी रेखा में हैं । जलवायु परिवर्तन से कृषि मजदूर प्रभावित हुए व 2025 की बाढ़ में लाखों बेरोजगार। समाज का विकास इन्हीं हाथों से होता है, खेत जोतने से लेकर स्मार्टफोन बनाने तक । फिर भी अमीर-गरीब की खाई दिन प्रतिदिन चौड़ी हो रही है।


मजदूरों का यह शोषण वैश्विक संकटों में और भी भयावह हो जाता है। 2025 का ईरान-अमेरिका युद्ध इसका जीता-जागता सबूत है। तनाव बढ़ा तो तेल $150/बैरल पहुंचा, भारत में महंगाई 12% उछली। फैक्टरियां बंद, बिजली-पानी, रसोई गैस सिलेंडर महंगा । गुजरात रिफाइनरियों में हड़तालें दबीं। ईरान बंदरगाह प्रतिबंधों से आयात ठप, मुंबई-चेन्नई डॉक मजदूर भूखे रहे। पाक सीमा तनाव से राजस्थान-हरियाणा के 5 लाख प्रवासी ट्रेनों में लौटे , कई रास्ते में मरे। दिल्ली निर्माण स्थलों पर बांग्लादेशी-नेपाली श्रमिक भागे, नए कोड ने 'अवैध' ठहराय - हिरासत, मारपीट हुई। उर्वरक महंगे होने से किसान-मजदूर खेत छोड़ शहर पलायन को मजबूर। निर्यात 20% गिरा, ऑटो प्लांट्स में 3 लाख नौकरियां गईं। परिवार भूखे, बच्चे स्कूल छोड़ सड़कों पर - यह पूंजीवाद की क्रूरता है, जहां युद्ध हथियार कंपनियों को मुनाफा व मजदूरों को कब्र देता है। कोविड की तरह, प्रवासी बेरोजगार, जलवायु बाढ़ों ने लाखों को बेघर किया। समाज की नींव रखने वाले ये हाथ टूट रहे हैं।


एक मई यही संदेश देता है कि मजदूरों को दृढ़ कानून, सुविधाएं और अवसर दें। श्रम कोड संशोधित करें: हड़ताल अधिकार बहाल, राष्ट्रीय लिविंग वेज ₹500/दिन, पूर्ण सामाजिक सुरक्षा। यूनियनों को ताकत, कौशल विकास के लिए आईटीआई अपग्रेड व डिजिटल ट्रेनिंग इत्यादि। प्रवासियों को पोर्टेबल बीमा-आवास, युद्ध जैसे संकटों में पलायन रोके जाएं। भेदभाव मिटाएं - शिक्षा, स्वास्थ्य, समान वेतन हों। सरकार-यूनियन-कॉरपोरेट मिलकर अमल करें। मजदूर ही समाज की रीढ़ हैं। उनके शोषण को रोककर ही मानवता का सच्चा विकास संभव है।तभी मेहनत का फल हर हाथ तक पहुंचेगा, मानवता का विकास होगा।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

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