मानवता के अजेय साहस की गाथा- नेल्सन मंडेला

 *अतीत के पन्नों से*


*मानवता के अजेय साहस की गाथा- नेल्सन मंडेला*


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


*10 मई 1994* की वह सुबह दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में केवल एक नई तारीख नहीं थी, बल्कि एक नए युग का सूर्योदय था। प्रिटोरिया के यूनियन बिल्डिंग्स के 'एम्फीथिएटर' में सजा वह मंच गवाह था उस जीत का, जो सदियों के दमन और रंगभेद (Apartheid) की काली रातों के बाद आई थी। अध्यापक 'लहर' पत्रिका के इस अंक में, आइए हम याद करें आधुनिक विश्व के 'मसीहा' नेल्सन मंडेला के उस सफर को, जिसने घृणा पर प्रेम की विजय गाथा लिखी।

दमन की बेड़ियाँ और संघर्ष की ज्वाला :-

दक्षिण अफ्रीका की धरती लंबे समय तक 'रंगभेद' की अमानवीय नीति से लहूलुहान रही। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ मनुष्य की पहचान उसके गुणों से नहीं, बल्कि उसकी त्वचा के रंग से तय होती थी। काले और श्वेत लोगों के बीच खींची गई उस नफरत की दीवार ने दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों को उनके अपने ही देश में 'अपराधी' और 'बहिष्कृत' बना दिया था।

नेल्सन मंडेला ने जब होश संभाला, तो उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ उनकी आजादी पर रोक नहीं, बल्कि उनके पूरे समुदाय की बेड़ियाँ थीं। इसी बोध ने एक डरपोक युवक को एक निडर विद्रोही में बदल दिया। उनके जीवन के 27 बहुमूल्य वर्ष जेल की कालकोठरियों में बीते, लेकिन उनकी आत्मा को कोई जंजीर नहीं जकड़ सकी। मंडेला का मानना था कि "साहस डर की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उस पर विजय पाना है।"

*10 मई 1994: स्वतंत्रता का इंद्रधनुष:-*

लंबे संघर्ष और अनगिनत बलिदानों के बाद वह ऐतिहासिक दिन आया जब दक्षिण अफ्रीका में पहली बार लोकतांत्रिक और गैर-नस्लीय सरकार की स्थापना हुई। पूरे विश्व के नेता इस 'मानवीय आपदा' के अंत और 'न्याय की जीत' के साक्षी बनने पहुँचे थे। दक्षिण अफ्रीका का आकाश उस दिन अलग-अलग रंगों के जेट विमानों के धुएँ से भर गया था, जो नए इंद्रधनुषी झंडे का प्रतीक थे।

मंडेला ने जब दक्षिण अफ्रीका के पहले *अश्वेत राष्ट्रपति* के रूप में शपथ ली, तो उनके शब्द न केवल उनके देश के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक नई दिशा थे।

शपथ ग्रहण के दौरान मंडेला का संबोधन केवल एक राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि शांति और क्षमा का घोषणापत्र था। उनके भाषण के कुछ मुख्य स्तंभ इस प्रकार थे:

 *अतीत से मुक्ति:* उन्होंने स्पष्ट किया कि अब इस खूबसूरत धरती पर कभी भी एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान का शोषण नहीं होगा।

 *समानता का संकल्प:* उन्होंने गरीबी, अभाव और हर प्रकार के भेदभाव से अपने लोगों को मुक्त करने की शपथ ली।

 *असाधारण मानवीय त्रासदी का अंत:* उन्होंने रंगभेद को एक ऐसी त्रासदी बताया जिसने समाज को गहरे घाव दिए थे, और अब उन घावों को भरने का समय था।

 *स्वतंत्रता का गौरव:* उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वतंत्रता का सूरज अब कभी अस्त नहीं होगा।

 

उन्होंने कहा कि 'मुक्तिदाता को भी मुक्त होना होगा' । 

मंडेला के चिंतन की सबसे रोचक और मानवीय बात यह थी कि वे केवल पीड़ितों की आजादी नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि *दमन करने वाला (Oppressor)* भी उतना ही कैदी है जितना कि *दमित (Oppressed)*। दमन करने वाला व्यक्ति घृणा, संकीर्णता और पूर्वाग्रहों की जेल में बंद होता है। मंडेला ने सिखाया कि सच्ची आजादी तब तक नहीं आती जब तक हम दूसरों की आजादी का सम्मान करना न सीख लें।


नेल्सन मंडेला का जीवन हमें सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से किसी दूसरे के रंग, धर्म या पृष्ठभूमि के आधार पर उससे नफरत नहीं करता। नफरत सीखी जाती है, और यदि नफरत सीखी जा सकती है, तो प्रेम करना उससे कहीं अधिक सहजता से सीखा जा सकता है। आज जब हम 'अतीत के पन्नों' को पलटते हैं, तो मंडेला का व्यक्तित्व एक ऐसे प्रकाश स्तंभ की तरह दिखता है, जो बताता है कि मानवता का गौरव किसी भी अत्याचार से बड़ा है।

नेल्सन मंडेला का वह सफर आज भी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो न्याय और समानता की मशाल थामे खड़ा है।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

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