*परिसीमन व महिला आरक्षण बिल के मायने*
✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महिला आरक्षण बिल एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, लेकिन परिसीमन की आड़ में इसका क्रियान्वयन सत्ता पक्ष की छद्म चालों को उजागर करता है। 21 सितंबर 2023 को लोकसभा और अगले दिन राज्यसभा से पारित यह बिल महिलाओं को संसद व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें देने का वादा करता है। फिर भी, केंद्र सरकार इसे तुरंत लागू करने के बजाय 2026 के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ रही है। क्यों? क्योंकि इससे लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 888 हो जाएंगी, और उत्तर भारत को भारी लाभ मिलेगा।
बिल के प्रावधान सरल लगते हैं, मगर गहराई में जटिलताएं छिपी हैं। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) महिलाओं के लिए मौजूदा अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित है-यानी SC सीटों का 33% और ST का भी। लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या सबसे अभिवंचित गरीब महिलाओं के लिए कोई अलग से प्रावधान नहीं है। विपक्ष ने OBC आरक्षण की मांग की, पर वह ठुकराई गई। इसका नतीजा यह होगा कि सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं के परिवार - पत्नियां, बहुएं या बेटियां - आरक्षित सीटों पर काबिज हो सकती हैं। पंचायती राज में 50% महिला आरक्षण के बावजूद 'सरपंच पति' संस्कृति इसका जीता-जागता प्रमाण है, जहां असली ताकत पुरुषों के हाथ में रहती है। भ्रष्ट व्यवस्था में आम गरीब महिला को टिकट ही नहीं मिलेगा, ऊपरी स्तर के 'परिवारवाद' को बल मिलेगा।
परिसीमन का खेल और भी चालाकी भरा है। 2001 की जनगणना पर आधारित यह प्रक्रिया 84वें संवैधानिक संशोधन (2002) के तहत स्थगित थी, अब 2026 में नए सिरे से होगी। उत्तर प्रदेश की 80 सीटें 143, बिहार की 40 से 85 हो सकती हैं । ये राज्य BJP-RSS के कट्टर हिंदू ताकतों के गढ़ हैं। इसके उलट, दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल - जहां जनसंख्या नियंत्रण बेहतर है, उनकी केंद्रीय चुनावों में हिस्सेदारी सिकुड़ जाएगी। द्रविड़ पार्टियां चिल्ला रही हैं कि यह 'उत्तर का वर्चस्व' स्थापित करेगा, संघीय ढांचे को तोड़ेगा। सत्ता पक्ष इसे 'जनसंख्या न्याय' कहता है, लेकिन हकीकत में हिंदी पट्टी को वोट बैंक मजबूत करने का हथियार मिल रहा है।
और सबसे बड़ा घाटा ? गरीब टैक्सपेयर्स का। वर्तमान 543 सांसदों पर सालाना ₹8,000 करोड़ से अधिक खर्च होता है । वेतन रूपए 1 लाख मासिक, भत्ते, यात्रा, आवास मिलाकर प्रति सांसद रूपए 1.5 करोड़ सालाना। 888 सांसद होंगे तो यह रूपए 13,000 करोड़ पार कर जाएगा। आपका-हमारा टैक्स इसी में लुटेगा, जबकि बुनियादी सुविधाओं के लिए पैसा कम पड़ता रहेगा। सत्ता में बने रहने की होड़ में सरकार ये चालें चल रही हैं । महिलाओं का नाम लेकर सत्ता का विस्तार।
फिर भी, उम्मीद बाकी है। यदि OBC समावेश हो और पारदर्शी चयन हो। लेकिन वर्तमान रूप में, यह सत्ता पक्ष की रणनीति ज्यादा लगती है। लोकतंत्र को सावधान रहना होगा।
✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।
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