शनिवार, अगस्त 11, 2012

विरहन की तड़फ

 
 
 
विरहन की तड़फ  
 
 
 
ओह निर्मोही !
मेरी जिंदगी थी
तेरी बंदगी ....
पर तूने मुझसे ही  
क्या कर डाली
ये दिल्लगी ......
साथी बना के
मुझको जीना सिखाया
जीवन का चमन
फूलों से खिलाया
सांझ हुई हो
या हो भौर
हाथ मिला कर चलते रहे
मंजिल की ओर ........
फिर क्यों ?
आखिर क्यों .......
बीच मंझधार 
छोड़ गया तू 
जीवन  रूख से
मेरा मुख भी
मोड़ गया तू
तन्हाई के  काँटों भरा
है ये सफ़र
मैं कैसे काटूं ......
तू ही था
मेरे सुख दुःख का साथी
अब ये दुःख मैं
किस से बाँटूं.........
अब ये दुःख मैं
किस से बाँटूं ...........
 

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