"झूठा सनम"
मेरी कसम उठाकर दुनिया के आगे ,
कर दिया मेरे प्यार से इन्कार उसने
एक दिन इसी दुनिया की कसम उठाकर ,
मुझसे प्यार का किया था इकरार जिसने
ऐ जिन्दगी तू ही बता ...............
उसकी किस कसम का एतबार करूँ मैं
समझा न जिसने नफरत के काबिल भी मुझे
क्या उसी से अब प्यार करूँ मैं ?
जान गया इस दुनिया में
बस नाटक है ये प्यार
कसमें ,वादे ,प्यार , मोहब्बत .........
सब झूठ का है व्यापार
गफलत में जीता रहा अबतलक
सच का कड़वा घूँट ये पीऊँ कैसे
जिंदगी बन गया जो ....
चाहे झूठा ही निकला ,
उस सनम के बिना अब जीऊँ कैसे
उस सनम के बिना अब जीऊँ कैसे ..........
कृष्ण कायत http://krishan-kayat.blogspot.com/

