मंगलवार, अप्रैल 30, 2019

अच्छे दिन

*अच्छे दिन*

निकल पड़े हैं
अलसुबह
ये हाथ
कूड़ा बीनने ।
वक्त के
बेरहम हाथों से
दो वक्त की
रोटी छीनने ।
सारा कूड़ा बीनकर
मेहनत तेरी
इस शहर की
शोभा बढ़ाती है ।
पर, सच
ये भी है कि
तेरी गंदी
झुग्गी - झोंपड़ी
इस सुंदर शहर का
मुंह चिढ़ाती है ।
सभ्य जनों का
बिखराया कचरा
उठा कर
तुम ले जाते हो ।
करते हो साफ़-सफाई
फिर भी
कचरे वाले कहलाते हो ।
शाइनिंग इंडिया में भी
चमक न आई तुझ पर
न फील-गुड़ में
गुड़ फील किया
हाथ के बहकावे में
बहकते रहे हर बार
अब फिर से कौन
तुम्हें बहका गये हैं ?
नियति ना बदली तेरी
कचरे से रोटी बीनने की
जबकि सभी के
अच्छे दिन आ गये हैं ......|
*कृष्ण कायत*
*मंड़ी डबवाली ।*

पेट की आग


कविता का शीर्षक - पेट की आग

तप रहा है
सूरज बहुत
आग रही
है बरस ।
जला रहा
सब कुछ
नहीं करता
कोई तरस ।
पशु-पक्षी भी
दुबके पड़े हैं
किसी न किसी
छाँव में ।
गली – नुक्कड़
सुन्न हैं सब
जैसे रहता ही
न हो कोई
गाँव में ।
मुंह – सिर
गमछे से लपेटे
वो चला रहा
कुदाल है ।
अपने आप से
बातें करता
विचारों का बुन रहा
जाल है ।
सोचता है कभी
सब कुछ छोड़
जाऊं भाग ....
पर
जानता है वो
“कायत”
ये आग तो कुछ नहीं
सबसे बड़ी होती है
पेट की आग.....

कृष्ण कायत
मंड़ी डबवाली ।
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