बुधवार, अगस्त 15, 2012

यादों के साये

 
 
 
 
यादों के साये 
 
हवा लहराई  
घटा गहराई
कोयल की कूक
सुन कर  थी
वो भी मुस्कुराई 
मुस्कुराते देख उसे 
बरबस ही 
मेरे होंठों पर भी
थी मुस्कान 
उभर आई 
भूल गया 
अब तो मैं 
भी मुस्कुराना 
वो तो किसी की 
हो गई 
और मैं 
हो गया बेगाना 
मेरी जिंदगी से 
तो अब 
लगता रूठ 
गई है बहार 
वो भी 
तब तलक थी 
जब तलक 
पास था यार 
अब न तो 
हवा लहराती है 
और न ही 
घटा गहराती है 
कोयल की कूक 
भी अब तो 
दिल को जलाती है 
पहले था 
खुद उसने सताया 
अब हर वक्त 
उसकी याद सताती है 
अब हर वक्त 
उसकी याद सताती है ............  

1 टिप्पणी:

  1. कोयल को सुन रहा है
    उसको देख रहा है
    मुस्कुरा रहा है
    ऎसा करेगा तो
    फिर कहेगा ही
    कोई याद आ
    रहा है !

    बहुत सुंदर !

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