रविवार, अगस्त 19, 2012

ठहराव


ठहराव
गुजर जो कहर   गया है
  ये जीवन भी ठहर गया है .............
 देख सिसकती ये हालत
 खो चुकी जीने की चाहत
भुलाने की कोशिश में
 और गहरी होती याद
हमसाया ही  बन गया
कैसा  कठोर निषाद
मृत हो गया है मन
जैसे पी ज़हर गया है
गुजर जो कहर   गया है
  ये जीवन भी ठहर गया है .......... 
  बिछड़ा साथी, उजड़ा कारवां
चिलचिलाती धूप में भी
अंधियारे का आभास है
मंजिल ओझिल, राहें गुम
गम भरी साँसों की भी
अब नहीं कोई आस है
खोया - खोया सा जहाँ
कैसी निस्तब्धता छाई है
लूट ले गया सारी    रौनकें
बीत ये जो पहर गया है
गुजर जो कहर   गया है
  ये जीवन भी ठहर गया है .......... 
krishan kayat
http://krishan-kayat.blogspot.com

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी पोस्ट 30/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 987 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  2. मन के भावों को बेहतरीन तरीके से संजोया है अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...