रविवार, अक्तूबर 20, 2013

 (ये तो होना ही था)












अब क्यों होता है उदास
ये तो होना ही था
भूल गया क्या
जो बोया था
बिसर कर सारी दुनिया
उस एक में जो खोया था
समझ बैठा कि सब कुछ
तेरा वो एक है
पर उसकी दुनिया में तो
तुझ जैसे अनेक हैं
पागल है जो जागे रातों को
उसे तो किसी के आगोश में
सोना ही था
कैसे बहलाऊँ, खुश रखूं तुझको
जब तेरी तक़दीर में
रोना ही था ...........
अब क्यों होता है उदास
ये तो होना ही था |

:----- कृष्ण कायत
;;;;;;;;;;;;;
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बुधवार, मई 29, 2013

" नादान "

 " नादान "

वो जानता है कि हम
उसके बिना रह नहीं सकते
इसीलिए इतना इतराता है वो.......
उसकी गलतियों पर
खफा हों भी तो कैसे
मुझे मनाने की बजाये
खुद रूठ जाता है वो ...........
मेरी जिंदगी बन गया
है प्यार उसका
तभी तो बार बार
मुझे सताता है वो ............
" कायत " बस गया
जो दिल की गहराइयों में
है जान से भी प्यारा
फिर क्यों नादान
इस दिल को जलाता है वो ...........

कृष्ण कायत ( पुरानी यादों से ..........)
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"प्यार"


             
                               "प्यार"

इश्क तो सदियों से रहा है काँटों का ताज
मासूम दिल उसे फूलों का हार समझ बैठा
बेमुरव्वत दौर में अपने भी हो गये हैं पराये
और नासमझ परायों को यार समझ बैठा
उसने तो की थी दिल बहलाने को दिल्लगी
ये नादाँ "कायत" उसे प्यार समझ बैठा ......

कृष्ण कायत ( पुरानी यादों से ...|)

शराफत

 (   शराफत  )

वहम में जीने की
जब आदत बन जाती है
सच्चाई का सामना
फिर आफत बन जाती है
दिल चाहता है
मचा दूं तूफ़ान इस ज़माने में
पर मजबूरियों में टूट कर
खामोश रह जाना
इस आम इंसान की
शराफत बन जाती है....

कृष्ण कायत
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(सबब )

            (सबब )

गुमनामियों के दायरे से निकल
वो इतना मशहूर हो गये ........
जितना हम उनके पास आये
वो उतना हमसे दूर हो गये ......
सीख लिया उसने ओरों संग जीना
पर हम टूट कर चूर हो गये ......

( वहम )

  ( वहम )
वो कहती है मुझसे
प्यार वहम होता है
इस दुनिया में
कोई नहीं
जो हमारा होता है
मैंने कहा
वहम ही सही
बना रहने दो
जीने का तो
इक सहारा होता है .......

मंगलवार, अप्रैल 30, 2013


    " साथ "
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 वो साथ चलने का
वादा करे तो
 मंजिल को
भूल जाऊं मैं
होगा जो साथ वो
तो मंजिल इक सजा है
क्यूंकि...........
 उसके साथ होने से
पहुँचने में नहीं
सफ़र में ही मजा है ......   कृष्ण कायत 


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बुधवार, अप्रैल 17, 2013

आशियाना

              " वीरान  आशियाना "

तुच्छ वीरान - सा 
मैं और मेरा आशियाना 
कभी भूले - भटके 
हो जो तुम्हारा आना 
अहसास करवा कर 
मेरी लाचारी का 
न दिल को जलाना 
ग़र लगा न सको 
मरहम मेरे ज़ख्मों पर 
तो नमक भी 
न छिडकाना 
भूले से भी 
आहत दिल पर पड़ा 
पर्दा ना उठाना 
याद से अतीत की 
मैं खुद तड़प उठता हूँ 
मुझे और न तडपाना 
हमदर्द ना बन सको तो 
झूठे दिलासों से ही 
मन को बहलाना 
" कायत " तो 
आज तलक रोता ही रहा है 
इसे और न रुलाना 
तुच्छ वीरान - सा 
मैं और मेरा आशियाना .... 


आरजू

            आरजू 

चमकती रेत  में
पानी का सिर्फ धोखा था 
मैंने समझा मेरा हमदम है 
पर वह तो हवा का झौंका था 
जिसकी दस्तक 
सुन कर मैं चौंका था 
जिनके दीदार को 
तरसती थी आँखें 
जो होते वो सामने 
तो खिल जाती थी बाँछे 
पर जाने वाले 
कब मुड़  कर आते हैं 
उन संग बिताये लम्हें ही 
दिल को तड़पाते हैं 
छुपाने का लाख 
प्रयत्न करते हैं 
पर ये ग़म 
कहाँ छुप पाते हैं 
इन्हीं विचारों में डूब 
ख्यालों में खो गया 
आरजू लिए मिलन की 
"कायत " 
गहन निद्रा में सो गया ...


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