मंगलवार, अप्रैल 30, 2013


    " साथ "
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 वो साथ चलने का
वादा करे तो
 मंजिल को
भूल जाऊं मैं
होगा जो साथ वो
तो मंजिल इक सजा है
क्यूंकि...........
 उसके साथ होने से
पहुँचने में नहीं
सफ़र में ही मजा है ......   कृष्ण कायत 


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बुधवार, अप्रैल 17, 2013

आशियाना

              " वीरान  आशियाना "

तुच्छ वीरान - सा 
मैं और मेरा आशियाना 
कभी भूले - भटके 
हो जो तुम्हारा आना 
अहसास करवा कर 
मेरी लाचारी का 
न दिल को जलाना 
ग़र लगा न सको 
मरहम मेरे ज़ख्मों पर 
तो नमक भी 
न छिडकाना 
भूले से भी 
आहत दिल पर पड़ा 
पर्दा ना उठाना 
याद से अतीत की 
मैं खुद तड़प उठता हूँ 
मुझे और न तडपाना 
हमदर्द ना बन सको तो 
झूठे दिलासों से ही 
मन को बहलाना 
" कायत " तो 
आज तलक रोता ही रहा है 
इसे और न रुलाना 
तुच्छ वीरान - सा 
मैं और मेरा आशियाना .... 


आरजू

            आरजू 

चमकती रेत  में
पानी का सिर्फ धोखा था 
मैंने समझा मेरा हमदम है 
पर वह तो हवा का झौंका था 
जिसकी दस्तक 
सुन कर मैं चौंका था 
जिनके दीदार को 
तरसती थी आँखें 
जो होते वो सामने 
तो खिल जाती थी बाँछे 
पर जाने वाले 
कब मुड़  कर आते हैं 
उन संग बिताये लम्हें ही 
दिल को तड़पाते हैं 
छुपाने का लाख 
प्रयत्न करते हैं 
पर ये ग़म 
कहाँ छुप पाते हैं 
इन्हीं विचारों में डूब 
ख्यालों में खो गया 
आरजू लिए मिलन की 
"कायत " 
गहन निद्रा में सो गया ...


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